किसान का मित्र कवक ट्राइकोडरमा

       किसान का मित्र कवक ट्राइकोडरमा-
 ■किसान का मित्र कवक ट्राइकोडरमा प्राकृतिक रूप से मृदा मेंं पाया जाता है l ट्राइकोडरमा जड़ क्षेत्र में लगातार काम करने वाला एक सूक्ष्म कार्यकर्ता है l हम जानते हैं कि मृदा में 1100 प्रकार के प्रजातियों के जीवाणु कवक और दूसरी प्रजातियों के जैसे -शैवाल ,कीट ,प्रोटोजोआ ,एक्टीनोमाइसीट्स जीवाणु अवशिष्ट पदार्थों को गला कर पोषक तत्व प्रदान करते हैं l मृदा उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं और फसल को हानिकारक कवकों से रक्षा करते हैं l यह कार्बनिक अवशेषों में पाए जातेे हैं l इसकी दो प्रजातियाँ विशेष रूप से प्रचलित हैं-ट्राइकोडर्मा विरिडी एवं ट्राइकोडर्मा हर्जियानम। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से उपयोगी है।  यह हानिकारक कवकों का नाश करता है l ट्राइकोडरमा विभिन्न प्रकार के कवक जनित बीमारियों से रक्षा करता है l ट्राइकोडरमा विभिन्न प्रकार के कवक जनित बीमारियों से रक्षा करता है l परंतु आज हम अंधाधुन कीटनाशक व कवक नाशक जैसे कई रसायनों का प्रयोग कर मृदा में उपस्थित कई सूक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचा रहे हैं जिससे इनकी संख्या में भारी कमी हो गई है l

■ट्राइकोडर्मा से रोग नियंत्रण-

ट्राइकोडरमा हानिकारक कवकनाशीओं से बचाता है l
जैसे-फ्यूजेरियम, पिथियम, फाइटोफ्थोरा, राइजोक्टोनिया, स्क्लैरोशियम, स्कलैरोटिनिया इत्यादि मृदोपजनित रोगजनकों की वृद्धि को रोककर पौधों में उनसे होने वाले रोगों से सुरक्षा करता है।  इसके अलावा नेमाटोड से भी फसलों को रक्षा करता है l ट्राइकोडरमा
 पौधों में उपस्थित रोगरोधी जीन्स को सक्रिय कर पौधों की रोगकारकों से लड़ने की आन्तरिक क्षमता का भी विकास करता है।

■ट्राइकोडरमा का फसलों में कई प्रकार से प्रयोग-

1-ट्राइकोडरमा से बीजों का उपचार- 5 ग्राम पाउडर 1 किलो बीच में प्रयोग कर सकते हैं यह पाउडर बीज में चिपक कर उसको सुरक्षा देता है यह जड़ों को चारों तरफ से घेर कर हानिकारक कवक से रक्षा करता है यह फसलों के अंतिम अवस्था तक बना रहता है l

2-ट्राइकोडरमा से मृदा उपचार - 1kg पाउडर को 25kg कंपोस्ट खाद में मिलाकर छायादार स्थान में रखकर जब स्पोर जम जाए फिर इसे 1 एकड़ खेत में मिट्टी में फैला देते हैं इसके उपरांत बुवाई कर सकते हैं l

3-ड्राईकोडरमा से बीज प्राईमिंग -बीज बोने से पहले खास तरह के घोंल की परत बीज में चढ़ाकर छायादार जगह में सुखाने कि प्रक्रिया को बीज प्राईमिंग कहा जाता है l
4-ट्राइकोडरमा का पौधों पर छिड़काव -5 से 10 ग्राम ट्राइकोडरमा 1 लीटर पानी में छिड़काव कर सकते हैं इससे हानिकारक कवकों के विरुद्ध लाभप्रद परिणाम मिलेगा l

5-ट्राइकोडरमा से जड़ों का उपचार- 250 ग्राम ट्राइकोडरमा में 10 से 20 लीटर पानी के साथ घोलकर रोपण करने वाले जड़ों को 30 मिनट तक डुबोकर इसके पश्चात खेत में लगाएं 

6-कंद उपचार: 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति लीटर पानी में डालकर घोल बना लें फिर इस घोल में कंद को 30 मिनट तक डुबाकर रखें। इसे छाया में आधा घंटा रखने के बाद बुवाई करें।

7-नर्सरी उपचार: बुवाई से पहले 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा उत्पाद प्रति लीटर पानी में घोलकर नर्सरी बेड को भिगोएँ।


8-कलम और अंकुर पौधों की जड़ डुबकी: एक लीटर पानी में 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा घोल लें और कलम एवं अंकुर पौधों की जड़ों को 10 मिनट के लिये घोल में डुबोकर रखें, फिर रोपण करें।

■ ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से लाभ-

1. यह रोगकारक जीवों की वृद्धि को रोकता है या उन्हें मारकर पौधों को रोग मुक्त करता है। यह पौधों की रासायनिक प्रक्रियाओं को परिवर्तित कर पौधों में रोगरोधी क्षमता को बढ़ाता है। अतः इसके प्रयोग से रासायनिक दवाओं, विशेषकर कवकनाशी पर निर्भरता कम होती है।
2. यह मृदा में कार्बनिक पदार्थों के अपघटन की दर बढ़ाता है अतः यह जैव उर्वरक की तरह काम करता है।
3. यह पौधों में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि को बढ़ाता है। टमाटर के पौधों में ऐसा देखा गया कि जहाँ मिट्टी में ट्राइकोडर्मा डाला गया उन पौधों के फलों की पोषक तत्वों की गुणवत्ता, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट, गतिविधि अधिक पाई गई।
4. यह पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है क्योंकि यह फास्फेट एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील बनाता है। इसके प्रयोग से घास और कई अन्य पौधों में गहरी जड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जो उन्हें सूखे में भी बढ़ने की क्षमता प्रदान करती है।
5. ये कीटनाशकों, वनस्पतिनाशकों से दूषित मिट्टी के जैविक उपचार (बायोरिमेडिएशन) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें विविध प्रकार के कीटनाशक जैसे-ऑरगेनोक्लोरिन, ऑरगेनोफास्फेट एवं कार्बोनेट समूह के कीटनाशकों को नष्ट करने की क्षमता होती है।

■ट्राइकोडरमा के प्रयोग में सावधानियाँ-

1. ट्राइकोडर्मा कल्चर/फार्मूलेशन को उचित एवं प्रमाणित संस्था अथवा कम्पनी से ही खरीदें।
2. कल्चर/फार्मूलेशन छः महीने से ज्यादा पुराना न हो।
3. बीज-पौधे उपचार का कार्य छायादार एवं शुष्क स्थान पर करें।
4. ट्राइकोडर्मा के साथ-साथ अन्य कवकनाशी रसायनों का प्रयोग न करें। प्रयोग के उपरांत 10 से 15 दिन तक रसायन का प्रयोग ना करें परिणाम लाभप्रद होगा l
5. उपचारित गोबर की खाद को लंबे समय तक ना रखें तुरंत इस्तेमाल कर लेवे l
6. सूखी मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का प्रयोग न करें। 
7. ट्राइकोडर्मा उपचारित बीज को सूर्य की सीधी धूप न लगने दें।
8. इसका असर क्षारीय भूमि में कम हो होता है l

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Comments

  1. वाह शानदार । ऐसे ही नये नये खोज करते रहिये।

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    1. कृपा दृष्टि बनाए रखिएगा सर जी

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  2. बेहतरीन कार्य श्रीमान

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    1. धन्यवाद आभार जितेंद्र भैया

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  3. उत्तम विचार लाभदायक बड़े भईया😍😍

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