सब्जियों में होने वाली खतरनाक बीमारी


सब्जियों में होने वाला खतरनाक बीमारी -पीला मोजेक


आमतौर पर मोजैक वायरस सब्जियों में देखा गया है जैसे करेला, कद्दू , लोकी, खीरा व टमाटर मोजैक वायरस के कारण पत्तियों पर पीले सफेद वह भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं जिसके कारण पौधे की बढ़वार रुक जाती है और फल भी विकृत प्रकार के होते हैं
 इस वायरस के कारण पत्तों के शिरा विन्यास पत्तों केे नशा भी पीले पढ़ने लगते हैं I
■इस वायरस को पहचान पाना बहुत ही मुश्किल होता है क्योंकि क्लोरोसिस डिफिशिएंसी आयरन की कमी के कारण भी इस प्रकार का लक्षण सब्जियों के पत्तियों पर भी दिखाई देते हैं I

■क्लोरोसिस डिफिशिएंसी और पीला मोजेक वायरस दोनों के लक्षण एक समान दिखाई पड़ते हैं किंतु  मोजैक वायरस सफेद मक्खी कीट के कारण फैलता है l
इस रोग का संचारण सफेद मक्खी द्वारा होता है।
इस कारण इस बीमारी में फफूंद नाशक दवाई भी कारगर साबित नहीं हो पाते l
 
■रोग फैलने का प्रमुख कारण->

फसलों में विषाणु रोगों के प्रकोप से काफी नुकसान होता है। विषाणु रोगों का महत्व इसलिये भी अधिक है क्योंकि इनके रोगकारक विषाणु का दायरा विस्तृत होता है तथा कई फसलों पर रोग उत्पन्न करते हैं। साथ ही इनका प्रसारण भी सुगमता से कीटों द्वारा, यांत्रिक विधियों व अन्य माध्यम से हो जाता है । इससे पैदावार कम हो रही है और 3-4 दिन के अन्दर पूरे खेत में फैल जाता है और सम्पूर्ण फसल पीली पड़ जाती है। 90 प्रतिशत से ज्यादा मिर्च की फसल में वायरस को फैलाने में सफेद मक्खी की भूमिका रही है। बीजों का उचित उपचार नहीं किया जाना, साथ ही जानकारी का अभाव, लंबे समय तक पडऩे वाला सूखा भी वायरस को फैलाने में सहयोगी रहता है। किसानों द्वारा अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग, बिना जानकारी के कीटनाशकों के मिश्रण का छिड़काव, किसानों द्वारा लगातार एक ही फसल का लिए जाना एवं फसल चक्र का न अपनाया जाना आदि कारण है। सब्जी की फसलों पर कीटाणु और वायरस अटैक से उड़द, सोयाबीन, मूंग, भिंडी, पपीता, मिर्च, आलू,  लोकी, खीरा व टमाटर 
 कद्दूवर्गीय सब्जियों आदि को नुकसान हो रहा है। सब्जी की फसलों में वायरस आक्रमण एवं कीटों के प्रकोप से गुणवत्ता प्रभावित हुई है। वायरस आक्रमण की स्थिति में विभिन्न सावधानियों द्वारा सब्जियों को प्रतिकूल प्रभाव से बचाया जा सकता है।

■रोग के लक्षण :
रोगग्रस्त पौधे की पत्तियों की नसें साफ दिखाई देने लगती हैं। उनका नरम पन कम होना, बदशक्ल होना, ऐंठ जाना, सिकुडऩे सहित अन्य लक्षण साफ दिखाई देते हैं। इसमें पौधों की पत्तियां भी खुरदुरी हो जाती हैं। मोटापन लिए गहरा रंग धारण कर लेती हैं और पत्तियों पर सलवट पड़ जाती है। कुछ पौधों में चितकबरे गहरे हरे-पीले धब्बे दिखाई देते हैं और एक-दो दिन बाद में संपूर्ण पौधे ऊपर से बिल्कुल पीले हो जाते हैं।
■अधिक प्रकोप की स्थिति में इस कीट की इल्लियों द्वारा कली, फूल, फली को खाकर खेत में नमी कम होने से फसल में बांझपन भी जाता है।

■बीमारी का उचित रोकथाम ->
कर्षण क्रिया विधि :

  • किसानों को खेत में रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर पर्णकुंचित पौधे को उखाड़कर गड्डे में डालकर मिट्टी से ढंक दे।
  • खेत में सफेद मक्खी को आकर्षित करने के लिए प्रति हेक्टेयर 5-6 पीले प्रपंच चिपचिपे टेग लगाये।
  • मिर्च की फसल के आस-पास या जाल के रूप में गेंदे को रोपे। मिर्च की 15 लाईन के बाद एक लाईन गेंदे की लगाये।
  • परभक्षी पक्षियों को आकर्षित करने के लिए टी आकार के बांस के डंडे 15 नग प्रति एकड़ गाड़ें।

■जैविक उपचार :
रोग की प्रारंभिक अवस्था में पौधे में नीम तेल छिडकाव 1-1.5 ली. प्रति एकड़ चिपकने वाले पदार्थ मिलाकर 200- 250 ली. पानी का घोल बनाकर करें, 20 लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती, 3 किलो धतूरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो बेशर्म की पत्ती, 2 किलो अकौआ की पत्ती, 200 ग्राम अदरक की पत्ती (यदि नहीं मिले तो 50 ग्राम अदरक), 250 ग्राम लहसुन, 1 किलो गुड़, 25 ग्राम लाल मिर्च डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें, यह घोले 1 एकड़ के लिए तैयार है इसे दो बार में 7-10 दिनों के अंतर से छिडकाव करना है प्रति 15 लीटर पानी में 3 लीटर घोल मिलाना है छिड़काव पूरी तरह से तर करके करना होगा नाइट्रोजन का प्रयोग बिल्कुल ही नही करें यह जहर का कार्य करती है

■रासायनिक उपचार
1- डाई मेथोईड 30EC -200ml प्रति एकड़
2-मेटासिटक 25 EC -200ml प्रति एकड़

Comments

  1. धन्यवाद सर उचित मार्गदर्शन के लिए ।🙏

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    1. धन्यवाद सर जी जानकारी देने के लिए🙏

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  2. इसी तरह फसलों के फोटोग्राफ्स व समस्याओं से हमें अवगत कराते रहिए गा

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  3. स्वागत है हमारे पेज पर

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  4. बहुत ही अच्छा है

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद डॉक्टर साहब

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