धान फसल के खतरनाक कीट ,बीमारियों का रामबाण इलाज
सरगुजा संभाग -कृषि प्रधान देश भारत के राज्य छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। हमारे राज्य में लगभग सभी जगह धान की पैदावार की जाती है, जिसमें अलग-अलग जलवायु, मिट्टी, पानी के अनुसार कई प्रकार के धान की पैदावार की जाती है।
अधिक उत्पादन के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन एक व्यापक पारिस्थितिक दृष्टिकोण है, जिसमें सभी उपलब्ध तकनीकों जैसे कि कल्चरल, आनुवांशिक, यांत्रिक, जैविक एवं रासयनिक कीटनाशकों को एक सामंजस्यपूर्ण और संगतपूर्ण रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे फसल में लगने वाले कीटों की संख्या को आर्थिक चोट स्तर से नीचे रखा जा सके | एकीकृत कीट प्रबंधन का उद्देश्य पर्यावरण की सुरक्षा के अलावा मानव और पशु स्वस्थ पर ध्यान देने के साथ फसल के नुकसान को कम किया जा सके |
धान की फसल में एकीकृत कीट प्रबंधन की प्रमुख तकनीकें :-
कल्चरल/संस्कृति तकनीक :-
यह आई.पी.एम की एक प्रमुख तकनीक है इसमें ग्रीष्मकालीन जुताई, स्वस्थ बीजों का चयन, समय पर रोपण, स्वस्थ नर्सरी की स्थापना, खेत से खरपतवार निकालना, उर्वरकों एवं रसायनों का संतुलित उपयोग इत्यादि तकनीकें आती है, जिनका उपयोग धान में कीट प्रबंधन के लिए किया जाता है |
यांत्रिक तकनीक :-
इसमें संक्रमित पौधों के हिस्सों को हटाना और नष्ट करना, धान की अंकुर युक्तियों की कतरन, अंडों एवं कीट के लार्वा को एकत्र कर नष्ट करना, जैविक ट्रेप, पीला ट्रेप इत्यादि का उपयोग कर कीटों को नियंत्रित किया जाता है |
जैविक नियंत्रण तकनीक :-
इसमें बायोकंट्रोल एजेंटों जैसे की – कोकिनेलीड्स, मक्खियों, मकड़ियों, ड्रेगनफलीज इत्यादि का प्रयोग एवं संरक्षण किया जाता है | अंडा परजीवों तथा ट्राइको–कार्ड इत्यादि का उपयोग भी इसी के अंतर्गत आता है |
व्यवहार पर नियंत्रण :-
इस तकनिक में धान की रोपाई के 10 दिन बाद पीला तना छेदक को फांसने के लिए फेरामोन ट्रैप, 20 ट्रैप / हेक्टेयर की दर से लगाए जाते हैं |
धान की फसल में रासायनिक नियंत्रण के उपाय :-
रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग आईपीएम में अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है | रासायनिक कीटनाशकों को उपयोग में लेने से पहले ईटीएल का निरिक्षण और प्राकृतिक वयोकंट्रोल एजेन्टों के संरक्षण को सुनिश्चित करना आवश्यक होता है |
धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग
बैक्टीरियल ब्लाइट-
रोग के पहचान -रोपाई पर, संक्रमित पत्तियां भूरे हरे रंग की हो जाती हैं और लुढ़क जाती हैं। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, पत्तियां पीली होकर भूसे के रंग की हो जाती हैं और मुरझा जाती हैं, जिससे पूरी पौध सूख जाती है और मर जाती है।
नोट -उच्च नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग इस स्थिति में ना करें क्योंकि यह रोग बढ़ने में सहायक होता है
रोग नियंत्रण-
● ताजा गाय के गोबर के अर्क का छिड़काव (20 ग्राम गाय के गोबर को 1 लीटर पानी में मिलाकर जमने और छानने उपरांत)। सतह पर तैरनेवाला 500 लीटर/हेक्टेयर की दर से छिड़काव के लिए लिया जाता है। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन जैसे एंटीबायोटिक्स का छिड़काव 15g/300l/ha. एग्रीमाइसिन 100 750g/500ली/हेक्टेयर।
झोंका/ब्लास्ट रोग :-
इस रोग का प्रकोप सामन्यत: असिंचित धान में अधिक देखा जाता है | इस रोग के प्रमुख लक्षण पौधों की पत्तियों, तना, गांठों, पेनिफ्ल व बालियों पर दिखाई देती है | इस रोग में पत्तियों पर आँख की आकृति अथवा सपिलाकार धब्बे दिखाई देते हैं, जो बीच में राख के रंग के तथा किनारों पर गहरे भूरे रंग के होते हैं | तने की गांठो तथा पेनिफल का भाग आंशिक अथवा पूर्णत: काला पड़ जाता है तना सुकड कर गिर जाता है | इस रोग का प्रकोप जुलाई से सितम्बर माह में अधिक होता है |
रोग नियंत्रण कैसे करें ?
- इस रोग के नियंत्रण के लिए ट्राईसाइक्लेजोल 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर के लगायें तथा आवश्यकता पड़ने पर1% कार्बेन्डाजिम का छिडकाव पुष्पन की अवस्था में करें |
- रोग प्रतिरोध प्रजातियों का उपयोग करें जैसे वी.एल. धान 206 , मझरा – 7, वी.एल.धान – 61 इत्यादि |
- इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर बाली निकलने के दौरान आवश्यकतानुसार 10–12 दिन के अन्तराल पर कार्बेन्डाजिम 50% घुलनशील धूल की 15–20 ग्राम मात्र को 15 ली. पानी में घोलकर छिडकाव करें |
भूरी चित्ती रोग :-
इस रोग में छोटे–छोटे भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर दिखाई देते हैं तो अत्यधिक संक्रमण की अवस्था में आपस में मिलकर पत्तियों को सुखा देते हैं और बालियों पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकल पाती | यह रोग कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक होता है |
रोग नियंत्रण के लिए क्या करें
- नत्रजन, फास्फोरस व पाटास उर्वरकों का प्रयोग संतुलित मात्रा में करें |
- थीरम5 ग्राम / किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर के बुवाई करें |
- रोग लक्षण दिखाई देने पर25% मैंकोजेब का छिडकाव करें |
पर्णच्छद अंगमारी शीथ ब्लाइट रोग :-
इस रोग के प्रमुख लक्षण पर्णच्छ्दों व पत्तियों पर दिखाई देते हैं | इसमें पर्णच्छद पर पत्ती की सतह के ऊपर 2-3 से.मी. लम्बे हरे–भूरे या पुआल के रंग के क्षत स्थल बन जाते हैं l
यह रोग कहां होता है-शीथ ब्लाइट उच्च तापमान (28-32 डिग्री सेल्सियस), नाइट्रोजन उर्वरक के उच्च स्तर और 85-100 प्रतिशत से आर्द्रता वाले क्षेत्रों में होता है। बारिश के मौसम में पौधे शीथ ब्लाइट की चपेट में आ जाते हैं। उच्च बोने की दर या पौधों की करीबी दूरी, फसल की घनी रोपाई, मिट्टी में बीमारी, स्केलेरोटिया या पानी में तैरने वाले सक्रमण शरीर, और अधिक उपज देने वाली उन्नत किस्मों का बढऩा भी रोग के बढ़ने में सहायक होते हैं l
रोग प्रबंधन :-
- फसल कटने के बाद अवशेषों को जला दें |
- खेतों में जल निकासी की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए तथा जल भराव नहीं होना चाहिए |
- रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपेकोनाजोल 20 मि.ली. मात्रा को 15 – 20 ली. पानी में घोलकर प्रति नाली की दर से छिडकाव करें |
आभासी कंड या फाल्स इस्मार्ट रोग:-
इस रोग के लक्षण बाली निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं | इसमें रोगग्रस्त दानें पीले अथवा संतरे के रंग के होते हैं जो बाद की अवस्था में जैतुनी काले रंग के गोले में बदल जाते हैं | इस रोग का प्रकोप अगस्त – सितंबर माह में अधिक दिखाई देता है |
रोग के कारण-
यह रोग Villosiclava virens नामक फफूंद से होता है, लेकिन यह तभी फसल में लगता है जब वातावरण में 90% से अधिक नमी रहती है और लगातार कई दिनों तक बादल छाए रहते हैं । रोग के लिए अनुकूल तापमान 25 - 30 डिग्री सेंटीग्रेड होता है ।
रोग प्रबंधन :-
- ग्रीष्कालीन गहरी जुताई करने से इसके फलनकाय नष्ट हो जाते हैं ।
- शुरुआती क्षणों में फफूंद नाशक ओं का प्रयोग कर शीघ्रता से नियंत्रण करें संक्रमित पौधों को सावधानीपूर्वक निकाल कर व जला कर नष्ट कर दें |
- रोग ग्रसित क्षेत्रों में पुष्पन के दौरान3% कापर आक्सीक्लोराइड 50% एस.पी. का छिडकाव करें |
Hexaconazole 5% EC का 450- 500 ml की मात्रा का प्रयोग प्रति एकड़ में प्रयोग करना चाहिए।
Tebuconazole 25.9 % EC का 300 ml प्रति एकड़ की मात्रा का प्रयोग करें
Azoxistorbin 11% + Propiconazole 18.3% SC का 300 ml प्रति एकड़ की मात्रा का प्रयोग करें।
Propiconazole 25 % EC का प्रयोग 200 ml प्रति एकड़ की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
खैरा रोग :-
यह रोग मिट्टी में जिंक की कमी के कारण होता है | इस रोग में पत्तियों पर हल्के पीले रंग धब्बे बनते हैं जो बाद में कत्थई रंग के हो जाता है |
खैरा रोग होने का प्रमुख कारण है मिट्टी में जस्ते की कमी।
इस रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तियों पर हल्के पीले पीले धब्बे गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनने लगते हैंl ,पौधों का विकास रुक जाता है जिस कारण पौधे बौने रह जाते हैं। ,प्रभावित पौधों की जड़ों का रंग भी कत्थई हो जाता है।
रोग प्रबंधन :-
जिंक सल्फेट+बुझा हुआ चूना (100 ग्राम + 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15 – 20 ली. पानी में घोलकर छिडकाव करें |
धान की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट
कीट तना छेदक एवं गुलाबी तना बेधक
इस कीट की सूडी अवस्था आक्रमक तथा क्षतिकारी होती है | इसमें सूड़ियाँ मध्य कलिकाओं की पत्तियों को छेदकर अन्दर घुस जाती है तथा अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गाँठ तक चली जाती है | अगर इस कीट का प्रकोप पौधे की बढ़कर अवस्था में अधिक होता है तो पौधों में बालियाँ नहीं निकलती है | यदि बाली अवस्था में प्रकोप हो तो बालियाँ सूखकर सफेद पड़ जाती है तथा दाने नहीं बनते | इस कीट का प्रकोप पर्वतीय क्षत्रों में असिंचित धान में तना छेदक की अपेक्षा अधिक पाया जाता है |
कीट प्रबंधन :-
- फसल की कटाई जमीन की सतह से करें तथा अवशेष ठुठों को एकत्रित कर के जला दें
- जिंक सल्फेट + बुझा हुआ चूना (100 ग्राम + 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15 – 20 ली. पानी में घोलकर छिडकाव करें | यदि बुझा हुआ चूना ना हो तो 2% यूरिया का घोल उपयोग कर सकते हैं |
- रोपाई करते समय पौधे के उपरी भाग को थोडा सा काटकर हटा दें जिससे इसमें उपस्थित तना छदक के अंडे नष्ट हो सके |
- अंडा परजीवी ट्राइकार्ड (ट्राइकोग्राम जपोनिकम) 2000 अंडे / नाली, कीट का प्रकोप प्रारम्भ होने पर लगभग 6 बार प्रयोग करना चाहिए अथवा फोरामोन टप का प्रयोग 500 वर्ग मी. क्षेत्रफल में (2.5 नाली) एक ट्रेप की दर से प्रयोग करें | 15 – 20 दिन के अंतराल पर ट्रेप का ल्यार का बदलते रहना चाहिए |
- 5 प्रतिशत सुखी बालियाँ दिखने पर केल्डान 4 जी अथवा पडान 4 जी दवा को 400 ग्राम / नाली की दर से प्रयोग करें |
- रासायनिक उपचार के लिए करटाप हाइड्रोक्लोराइड 50% एसपी 1 केजी /हेक्टेयर की दर से या फलोबेनडियामाइड 20% डब्लू जी 125 ग्राम पर हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें
धान का पत्ती लपेटक कीट :-
इस कीट की मादा पत्तियों की शिराओं के पास समूह में अंडे देती है जिनसे 6 से 8 दिन में सुंडियाँ निकलकर पहले मुलायम पत्तियों को खाती है तथा बाद में अपने लार द्वारा रेशमी धागा बनाकर पत्तियों के किनारों को मोड़ देती है | यह सुंडियों पत्तियों को अंदर ही अंदर खुरचकर खाती है , जिससे धान की पत्तियाँ सफेद व झुलसी हुई दिखाई देती है | इस कीट का प्रकोप अगस्त – सतम्बर माह में अधिक होता है |
रोकथाम कैसे करें :-
- खेत व आस – पास की मेड़ों पर उगी हुई घास एवं खरपतवारों को निकालकर व जला कर नष्ट कर दें क्योंकि यह कीट पहले इन्हीं पर पनपता है|
- फेनिट्रोथियोन 50 ईसी 1000 मिली/हेक्टेयर
- मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल 1000 मिली हेक्टेयर
- फॉसालोन 35 ईसी 1500 मिली/हेक्टेयर (या) क्विनालफॉस 25 ईसी 1000 मिली/हेक्टेयर
- डाइक्लोरवोस 76 डब्ल्यूएससी 250 मिली/हेक्टेयर
- फॉस्फैमिडोन 40 एसएल 600 मिली/हेक्टेयर
- कार्बेरिल 50 डब्ल्यूपी 1.0 किग्रा/हेक्टेयर
- फेनथियन 100 ईसी 500 मिली/हेक्टेयर (या) प्रोफेनोफोस 50 ईसी 1000 मिली / हेक्टेयर।
- फेरोमोन ट्रैप 10 से 12/ हेक्टेयर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं
धान का गंधी बग :-
इस कीट का व्यस्क लम्बा, पतला व हरे रंग का उड़ने वाला होता है | इस कीट से आने वाले दुर्गन्ध से भी इस कीट की पहचान की जा सकती है | यह कीट दुधिया दानों को चूसकर क्षति पहुंचाता है , जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं तथा दाने अंदर से खोखले हो जाते हैं |
गंधी बग का कीट का नियंत्रण कैसे करें ?
- खेत से एवं आसपास के मेड़ों से घास एवं अन्य खरपतवार को निकालकर और जलाकर नष्ट कर दें |
- यदि एक या एक से ज्यादा कीट प्रति पौधा दिखाई दें तो मालाथियान 5% विष धूल की 500 – 600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से बुरकाव करें |
- प्रकाश प्रपंच का प्रयोग भी कर सकते हैं |
- अंडा परजीवी ट्राईकोग्रामा जापोनिकम का प्रयोग करें |
- 10% पत्तियाँ क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50% घुलनशील धूल का 2 ग्राम / ली. पानी का घोल बनाकर छिडकाव करने से भी इस कीट से होने वाली क्षति को नियंत्रित किया जा सकता है
- रासायनिक उपचार lambda-cyhalothrin 5 % EC 200ml / 150 लीटर पानी में प्रति एकड़ घोलकर छिड़काव करें l
हिस्पा कीट :-
असिंचित धान में इस कीट का प्रको बीप जुलाई – अगस्त माह में अधिक देखने को मिलता हैं | सिंचित धान में यह कीट क्षति नहीं पहुंचा पाता | यह कीट धान के पौधों की जड़ों को खाकर नष्ट करती है, जिससे पौधा पीला पड़ जाता है और बाद में सुखकर गिर जाता है | एसे संक्रमित पौधों को पकड़कर खींचने पर आसानी से उखड़ जाते हैं |
हिस्पा कीट का नियंत्रण कैसे करें
- फसल कटने के बाद खेतों की गहरी जुताई कर के छोड़ दें |
- खेतों में सड़ी हुई गोबर खाद का प्रयोग करें |
- मई – जून माह से ही प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें |
- खड़ी फसल में क्लोरपाइरिफांस 20 EC की 80 मि.ली. को 1 किलोग्राम सूखी बालू / राख में मिलाकर मृदा के उपर बुरकाव करें |
- क्लोरपीरिफॉस 50%+ साइपरमैथरीन 5 % EC 200ml /150 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें l
नोट -यह जलमग्न खेत, उच्च छाया और आर्द्रता वाले क्षेत्रों में भी होता है।
धान के पौधों की घनी बीज वाली फसलें, नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग और शुरुआती मौसम में कीटनाशकों का छिड़काव भी कीट फैलने का कारण बन सकता है l
कृषि विभाग ,बलरामपुर छत्तीसगढ़
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